
(महावातर नरसिम्हा सम्पूर्ण कथा
हाँ नरसिंहा
जो थर थराए पाप से धरा विकल हो ये गगन
तो अवतरित हो नाथ विष्णु चेर सिंधु त्याग के
पुकार ले गुहार ले जो भक्त पूरे भाव से
वो दौड़े आए छोड़ के बिछौने शेष नाग के
जो अंतरिक्ष की समस्त तारिकाएं गा रही
भागवत पुराण में लिखी है वो अमर कथा
हिरण्य कश्यप एक था असुर के जिसके त्रास से
ये सृष्टि त्राहि त्राहि त्राहि कर रही थी सर्वथा
दिया था वर जगत पिता ने उसको ऐसी शक्ति का
कि जो लड़ेगा उसकी क्रूरता से हार जाएगा
हां… मनुष्य ना ही देवता ना जीव जंतु पशु कोई
समस्त विश्व में कोई ना उसको मार पाएगा
कभी-कभी विचित्र खेल खेलता है यह समय
जो बुद्धि बल से आज तक कोई नहीं समझ सका
हुआ उसी के घर में एक धर्मनिष्ठ का जन्म
वो दैत्य राज जो प्रतीक था स्वयं अधर्म का
था स्वयं अधर्म का
नर नर सिंह
नर नर नर नर
विष्णु जी को शत्रु मानता रहा असुर पिता
उनहीं से जाके पुत्र की सब आस्थाएं जुड़ गई
हिरण्य कश्यप एक क्षण ये सोच के सहम गया
कि राक्षसों की रीतियां ये किस दिशा में मुड़ गई
प्रबल थी इतनी शत्रुता की क्रूरता मचल उठी
कोमलता हृदय में जो वो विष चढ़ा के सो गया
अडी पिता ने पुत्र को ही प्राण दंड दे दिया
हुआ नहीं था जो कभी अनर्थ वो भी हो गया
मगर अमर विपियों के घेर ले तो जान लो
की आसरा है विष्णु का ही सब सहारे छोड़ के
बचाओ नाथ आओ नाथ राम राम भक्त है
पुकारने लगा प्रहलाद
दोनों हाथ जोड़ के
चौंधने लगी गगन में बिजलियों पे बिजलियाँ
कड़क उठे गरज उठे करोड़ों मेघ एक साथ
निशब्द से अवाक से हताश से खड़े रहे सहस्त्र कोटि देवता
ये दृश्य देख एक साथ
शेर की दहाड़ सुन चटक गयीं शिला शिला
दरक गए नक्षत्र भी प्रचंड सिंह नाद से
गटार के सवार रख दशे असुर के वक्ष में
तो लाल लाल हो गयीं दिशाएं रक्त पात से
महान भक्त को मिला
महावतार का दरस
समस्त प्रार्थनाएं फल गयी जो की थी नाथ से
अधर्म का घना अँधेरा यूँ परास्त हो गया
विजय से रात्रि हार गयी पराक्रमी प्रभात से
नरसिंहा
रचा है सृष्टि
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं
आरती विष्णु जी की
हरि नाम की छाँव तले
हरि सुंदर नंद मुकुंदा
हरी नाम की माला जप ले
हरि नाम नहीं तो जीना क्या
मंगलम् भगवान विष्णु
श्री हरि स्तोत्रम्
ॐ नमो: भगवते वासुदेवाय नमः
रट ले हरि का नाम रे प्राणी
हे विष्णु विधाता
हरिदूत
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