
सखिया रोवे रघुवर के बिना
मोरी उमर बीत मिथिला नगरी
वनवास से प्रभु कब आओगे
मेरे दिल की प्यास बुझाओगे
प्रभु ख्याल करो ससुराल पूरी
हे भरत शत्रुघन दो भाई
अब ख्याल करो है रघुराई
उर्मिला के पति है लक्ष्मण जी
तुम चारो भाई को कहा है जाना
यह अवधपुरी में खुश रहना
सीताजी सहेली भाग्यवती
मिश्रा बंधु जी गावे मिलकर के
तेरे नाम का सुमिरन
त्रिभुवन विदित अवध जेकर नौआ
तू ही उना तरदा
श्याम नाम का साबुन
हनुमान चालीसा
पालकी ये दिल की
बालाजी की शरण तू आजा
जिसने भी श्याम से प्रीत लगाई
श्री हनुमान चालीसा
दत्तात्रेय आरती
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