
Sanskrit Shlok On Karma
सन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगत:
योगयुक्तो मुनिब्रह्म नचिरेणाधीगच्छति
भक्ति में लगे बिना केवल समस्त कर्मो का परित्याग करने से कोई सुखी नहीं बन सकता परन्तु भक्ति में
लगा हुआ विचारवान व्यक्ति शीघ्र ही परमेश्वर को
प्राप्त कर लेता हैं।
न कृतत्व न कर्मणि लोकस्य सृजति प्रभु
न कर्मफलसयोग स्वभावस्तु पर्वतरते
श्रयान् स्वधर्मो विगुण परधर्मात् स्वनुष्टितात्
स्वधर्म निधन श्रेय: परधर्मो भयावह:
सन्यास: कर्मयोगश्व नि: श्रेयसकरावुभौ
तयोस्तु कर्म सन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते
मुक्ति के लिए तो कर्म का परित्याग तथा भक्तिमय-कर्म
दोनों ही उत्तम हैं किन्तु इन दोनों में से कर्म के परित्याग से भक्तियुक्त कर्म श्रेष्ठ हैं।
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगा:
कोई भी काम मेहनत से ही पूरा होता हैं बैठे बैठे
हवाई किले बनाने से नहीं अर्थात सिर्फ सोचने भर
से नहीं ठीक उसी प्रकार सोते हुए शेर के मुँह में
हिरण खुद नहीं चला जाता।
न कश्चित कस्यचित मित्रम् न कश्चित कस्यचितपुरु ।
व्यवहारेंण जायते मित्राणि रिपव्यस्तथा ।।
अध चित्त समाधातु न शक्रोषि मयी स्थिरम्
अभ्यासयोगने ततो मामिच्छापतु धनश्चय
यद्त्सद्स्यते लोके सर्व तत्कर्मसंभवम्
सर्वा कर्मानुसारण जंतुभौगांभुक्ति वै
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदु: खदा:
आग मापायिनोनित्यास्तासिततिक्षस्व भारत
वाणी रसवती यस्य यस्य श्रमवति क्रिया
लक्ष्मी: दानवती यस्य सफलम् तस्य जिवितम्
विपदी धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसी वाक्पटुता युधि विक्रम:
यशसि चाभी रुचिवैर्यसन्न श्रुतौ प्रकृतिसिद्धिमिद हि महतमनाम्
हिंदी · Read on Bhajan Baan
Share this bhajan with your family
Send it to your satsang group before kirtan so everyone has the words.




