
आँखों के आंसू हर पल पुकारे,
आजा हारे के सहारे,
तर्ज – कब आएगा मेरे।
गहरी नदी है तेज है धारा,
रात अँधेरी दूर किनारा,
माँझी बनकर करके तू ही तो,
सबको पार उतारे,
आस की माला टूट गई है,
शायद किस्मत रूठ गई है,
गैर हो गए जो थे अपने,
हम अपनों से हारे,
ऐसा कोई नजर ना आए,
जो इस दिल को धीर बंधाए,
जो देखे थे सपने मैंने,
चूर हो गए सारे,
देर करो ना कृष्ण कन्हैया,
पार लगा दो मेरी नैया,
कैसे फूल खिलेंगे ‘बेधड़क’,
ये पतझड़ के मारे,
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