
कैकेई के वचन कठोर,
भरत के सुनतहि अंसुआ भर आए,
जननी के वचन कठोर,
धागा हो तो तोड़ दूं मैं,
पर वचन न तोड़े जाएं,
चिठ्ठी जो होती वाच सुनाते,
मोसे करम ना वांचे जाए,
कुवना जो होता हम पाट देते,
समुद्र ना पाटे जाए,
गायक – गोलू ओझा।
प्रेषक – मनीष प्रजापति।
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