
गंगा से गंगाजल भरके काँधे शिव की कावड़ धरके
गंगा से गंगाजल भरके,
काँधे शिव की कावड़ धरके,
भोले के दर चलो लेके कावड़ चलो,
तर्ज – नदियाँ चले चले रे धारा।
सावन महीने का पावन नजारा,
अद्भुत अनोखा है भोले का द्वारा,
सावन की जब जब है बरसे बदरिया,
झूमे नाचे और बोले कावड़िया,
रस्ता कठिन है और मुश्किल डगर है,
भोले के भक्तो को ना कोई डर है,
राहों में जितने भी हो कांटे कंकर,
हर एक कंकर में दीखते है शंकर,
कावड़ तपस्या है भोले प्रभु की,
ग्रंथो ने महिमा बताई कावड़ की,
होंठो पे सुमिरन हो पेरो में छाले,
‘रोमी’ तपस्या हम फिर भी कर डाले,
गायक – संजय मित्तल जी।
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