
जीवन का क्या ठिकाना,
करले जतन मेरे मनवा,
एक रोज हमको जाना,
तर्ज – मौसम है आशिकाना।
जीवन है एक सराय,
एक आए एक जाए,
करके विचार देखो,
दुनिया मे हम क्यो आए,
भजले हरि को वर्ना,
यमलोक होगा जाना,
जग मे मजे उड़ाने,
को तन नही मिला है,
मुरझाएगा ये एक दिन,
ये बाग जो खिला है,
जीवन कई मिलेगे,
मुश्किल है तन ये पाना,
भजले हरि को मनवा,
चाहे ये जिँदगानी,
कर अब न आनाकानी,
ओ मनवा अभिमानी,
गुरू जो बताई रस्ता,
उस पर तू चलते जाना,
– भजन लेखक एवं प्रेषक –
शिवनारायण वर्मा,
मोबा.न.8818932923
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