
जो कुछ भी हूँ जहाँ भी हूँ,
प्रभु आपकी कृपा है,
गुणगान जितना भी करूँ,
थकती नही जुबा है,
तर्ज – तुझे भूलना तो चाहा।
सोचा नहीं था वो मिला,
मुझे आपके ही दर से,
सिक्का ये खोटा चल गया,
प्रभु आपके असर से,
रहता है सर मेरा प्रभु,
रहता झुका झुका है,
जितनी निभाई आपने,
कैसे निभा सकूँगा मैं,
अहसान आपका प्रभु,
कैसे चूका सकूँगा मैं,
नौकर के सर से मालिक का क्या,
कर्जा कभी चूका है,
तेरी कृपा के बिन प्रभु,
कुछ ना मिले जहा में,
मर्जी बिना तेरे प्रभु,
ना पत्ता हिले यहाँ पे,
होता वही जो आपने,
तक़दीर में लिखा है,
रहते है जो भी मालिक की,
‘रोमी’ रजा में राजी,
कभी हारते नहीं है वो,
जीवन की कोई बाजी,
प्रभु प्रेमियों का आपके,
कोई काम ना रुका है,
– स्वर व लेखन –
रोमी जी
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