
ठाड़े रहियो तनिक रघुवीर,
नाव मेरी लकड़ी की,
लकड़ी की हाँ लकड़ी की।
अपनी नाव में ना तुम्हे चढ़ाउ,
पहले चरण आपके धुलाऊ,
पीछे धुलवाऊ लक्ष्मण बीर,
इन चरणन की सुनी महिमा भारी,
पत्थर सिला बनी है नारी,
में तो हो जाऊ खड़ा फ़क़ीर,
मन में सोच रहे रघुराई,
मंद मंद रहे वो मुस्काई,
मेरे मन को लिया है जीत,
नाइ हमपे है रुपया ढेला,
नाइ हमपे है माल खजाना,
कहा लागे तेरी उतराई,
धन दौलत और सोना चाँदी,
ये तो माया आनी जानी,
नाइ इनपे बिगाड़ू में नीत,
मैंने प्रभु सरयू पार उतारे,
जब में आउ द्वार तिहारे,
मोहे पार लगाइयो रघुवीर,
बैकुंठ लोक में जाऊ रघुवर,
एक मढ़ैया बनवाओ रघुवर,
बस यही हमारी फीस,
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