
दिव्य धरा यह भारती,
छलक रहा आनंद,
नव सौंदर्य संवारती,
शीतल मंद सुगंध,
उतारे आरती जय माँ भारती,
युग युग से अनगिन धाराएँ,
सेवा में तेरी,
गंगा यमुना सिन्धु नर्मदा,
कृष्णा कावेरी,
जल जीवन से इसकी माटी,
उपजाती है अन्न,
पावन भावन इसके आंगन,
पंछी चहक रहे,
अंग अंग में रंग सुमन के,
खिलते महक रहे,
सदा बहाती मीठे फल,
अमृत रस धार अखंड,
गगन चूमती पर्वत माला,
वैभव का आलय,
सागर जिनके चरण पखारे,
गूंजे जय जय जय,
सारा जग आलोकीत होता,
पातव तेज प्रचंड,
प्रगटाती है मंगलकारी,
तत्या सुखद किरण,
ज्ञान भक्ति और कर्म त्रिवेणी,
स्पंदित है कण कण,
परहित मे जीवन जीने मे,
रहती सदा प्रसन्न,
यही भूमि है जिसकी गोदी,
प्रगटे पुरूषोत्तम,
यही दिया था योगी राज नेे,
कर्म योग अनुपम,
सत्य निष्ठ यह पुण्य भूमि है,
सभी विडारे द्वंद्व,
गायक – प्रकाश माली जी।
प्रेषक – मनीष सीरवी
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