
परदेसी परदेसी चला गया,
पिंजरा तोड़ के,
फिर कैसे रिश्ते नाते,
कैसी ये माया,
तेरे ही अपनो ने,
तुझको जलाया,
तर्ज – परदेसी परदेसी जाना नहीं।
मैं ये नहीं कहता,
की भंडार मत भरना,
मगर इस आत्मा का,
ऐतबार मत करना,
माल खजाने तेरे,
काम ना आएंगे,
तेरे कपडे भी,
उतारे जाएंगे,
श्राद्ध पक्ष में,
तुझको हार चढ़ाएंगे,
तेरे पीछे खीर जलेबी खाएंगे,
क्यों गफलत में जीते हो,
कुछ काम करो,
तज माया अभिमान,
राम का नाम जपो,
राम का नाम ही,
बेड़ा पार लगाएगा,
अंत समय में,
काम यही बस आएगा,
स्वर – श्री गोपाल जी बजाज ‘परीक्षित’।
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