
पर्वत दियां कावा वे तेथो दूर बलावा वे ,
मेरी माई दी गल सूना मेनू,
तेनु चुरियाँ कूट कूट पावा वे पर्वत दियां कावा,
दस बरमा विष्णु महादेव ओहदी पूजा किदा करदे ने,
ओहदे नाम दे सागर विच किदा इन्दर ते नादर तारदे ने,
ग्रन्थ प्रो के फुला दे किस वेले हार ल्याउन्दी ने,
किस वक़्त कुबेर खजाने दी एथो चाभी मंगन आउंदे ने,
ओहदा भवन सुनेहरी थोवन नु,
किवे घिर घिर औन घटावा वे पर्वत दिया कावा,
कदों पींघा झुटन लगदियां उठे नोवे दुर्गा शकतियाँ,
किस वेले सुर नर ऋषि मुनि उथे बहके करदे भग्तियाँ ,
केहड़े उची अलख ज्गांव्दे केहड़े सिमरन करदे मों वे,
माँ जिह्ना नु वर देई जावेगी ओह भागा वाले कौन वे,
किस तरफो चन्दन भिजियाँ,
ओहदे दर ते औन हवावा वे परबत दिया कावा,
किवे ज्योत होई प्रचंड वे किवे नूर दी झोली भर गई ,
किवे चरण माई दे धो धो के ऐ गंगा झटपट तर गई,
बस भगत ध्यानु किस त्र ओहदी भगती अन्दर खो गया,
ओह सिर दी भेट चडा के ते किवे माँ दा प्यारा हो गया,
ओह केह्दा सी जिहने आखियाँ,
की मावा ठंडियाँ छावा वे पर्वत दियां कावा,
किवे अकबर वरगे शहंशाह ओहदा देख करिश्मा झुक गये,
किवे घोड़े दा सिर जुड़ गया किवे झुल्दे झखड रुक गये,
किवे अरबा ही खरबा गुनागार ओथे पाप दे थबे धो गये,
किवे जन्म दे गूंगे उस था झट बोलन जोगे हो गये,
निर्दोष माई नु किस तरा ,
मैं पूजन दर ते जावा वे पर्वत जोगे हो गये
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