
पल में आता पल में जाता,
पल में खेल रचाता है,
उस पल की कोई गम नहीं करना,
हरि कैसा रूप दिखाता है।।
किस पल में वह बाग लगाता,
किस पल फूल खिलाता है,
किस फल में वह सुगंध भरता,
किस पल में सूख जाता है,
जल कि वह एक बूंद बनाता,
बूंद में बीज लगाता है,
अण्ड बनाकर पण्ड बनाता,
पण्ड माई प्राण बसाता है,
त्रिवेणी की तीरा उपर,
साधु माला भजता है,
रमता खेलता जग के माई,
कोई कोई बिरला पाता है,
शंभू नाथ जी सतगुरु मिलिया,
गुरुओं का उपदेश बताता है,
जात पात गांव नहीं ठाना,
यू शंकर भजन में गाता है,
गायक – भेरुपुरी जी गोस्वामी।
प्रेषक – मदन मेवाड़ी।
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