
पलट सुदामा देखन लागे,
कित गई मोरी टपरिया रे,
जा कुन बनवा दई अटरिया रे,
कुन बनवा दई अटरिया रे।।
जहां तो थी मोरी,
कांस की टपरिया,
कंचन महल बनवा दये रे,
जहां तो थे मोरे तुलसी के वृक्षा,
चंदन पेड़ लगवा दये रे,
यहां तो थी मेरी बूढ़ी ब्राम्हणी,
जाए रंभा कौन ने बनवा दये रे,
गायक – गोलू ओझा अशोकनगर।
प्रेषक – मोहन राजपूत।
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