
बंधन काट किया निज मुक्ता,
सारी विपत निवारी,
मारा सतगुरु ने बलिहारी।।
वाणी सुणत प्रेम सुख उपज्यो,
दुरमति गई हमारी,
भरम करम का सासा मेटिया,
दिया कपट उगाडी,
माया बिरम का भेद समझाया,
सोहम लिया विचारी,
आदि पुरूष घट अन्दर देख्या,
किना दूर विचारी,
दया करी मेरा सतगुरु दाता,
अबके लीना उबारी,
भव सागर से डूबत तारया,
ऐसा पर उपकारी,
गुरू दादू के चरण कमल पर,
मेलू सीश उतारी,
ओर लेय क्या आगे राखू,
सुन्दर भेंट तुम्हारी,
– भजन प्रेषक –
सिंगर रूपलाल लोहार
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