
बड़े बड़ाई ना करे बड़े ना बोले बोल
बड़े बड़ाई ना करे बड़े ना बोले बोल
रहिमान हीरा कब कहे लाख टका मेरा मोल
जो बाडेन को लघु कहे
नही रहीं घट जाए
गिरिधर मुरली धार कहे
कछु दुख मानत नाही
रहीमा कुछ दुख मानत नाही
ज्ञानी से कहे कहा कहत कबीर लजाये
अंधे आगे नाचके कला अकारत जाए
कबीरा कला अकारत जाए
ऐसी बानी बलिए मन का आपा खोए
औरान को शीतल करे आपहु शीतल होये
कबीरा आपहु शीतल होये
रात गवाई सोए के
दीवास गवाई खाए
हीरा जानम अमोल था
कौड़ी बदले जाए
कबीरा कौड़ी बदले जाए
तुलसी भरोसे राम के
निर्भय होके सोए
अनहोनी होनी नही
होनी हो सो होये
मेरी भाव बढ़ा हरो
राधा नगर सोए
जतन की छाया पड़े
श्याम हरित दुति होये
दुख में सुमिरन सब करे
सुख में करे ना कोए
जो सुख में सुमिरन करे तो
दुख कहे को होये
कबीरा दुख कहे को होये
आवाट ही हारते नही
नैनन नही स्नेह
तुलसी वाहा नही जाइए
चाहे कंचन बरसे मेह
तुलसी कंचन बरसे मेह
बुरा जो देखन मैं चला
बुरा ना मिलया कोए
जो दिल खोजा अपना
मुझसे बुरा ना कोए कबीरा
मुझसे बुरा ना कोए
रहिमान धागा प्रेम का
मत तोडो चटकाए
टूटे से फिर ना जुड़े
जुड़े गात पद जाए
रहिमा जुड़े गाठ पड़ जाए
बिगड़ी बात बने नही
लाख करो किन कोए
रहिमान बिगड़े दूध को
माथे ना माखन होये
रहिमा माथे ना माखन होये
सुन भाई साधु कहे कबीरा जब मैं था हरी नही
उड जा हंस अकेला – एक डाल दो पंछी बैठा
कबीर के दोहे – बड़े बड़ाई ना करे बड़े ना बोले
दुख में सुमिरन सब करे सुख में करे ना कोए
राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट – कबीर
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