
बाँह पकड़ ले साँवरा कही छूट ना जाए
बाँह पकड़ ले साँवरा,
कही छूट ना जाए।
दोहा – मेरे ऐब गुनाह ना वेख मेरे बाबा,
नी मैं ऐबा नाल भरपूर,
चंगिया हर कोई गल लांदा,
नी मेनू मंदे नु कर मंजूर।
जग माया के इस दरिया में,
डूब ना जाए,
जिनको अपना मान के,
नाज़ किया था कितना,
दुःख आया तो,
साथ रहा ना कोई अपना,
बस इक आस बची बाबा,
कहीं टूट ना जाए,
पैसा शोहरत नाम और इज्जत,
जोड़ रहा था,
ना जाने किस,
अंधी दौड़ में दौड़ रहा था,
पाप ही पाप भरी गागर ये,
कहीं फुट ना जाए,
अब भी हार के बैठ गया,
तेरे इन चरणों में,
‘लहरी’ आजा बस जा,
मेरे इन नैनो में,
आजा रे आँखे कबतक मेरी,
नीर बहाए,
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