
भले कुछ और मुझे,
तू देना ना देना,
मगर इतनी किरपा,
श्याम मुझ पे करना,
खर्चा मैं घर का चलाता रहूँ,
जब तू मुझे बुलाए खाटू आता रहूँ,
तर्ज – मेरा एक सपना है।
दुनिया की नजरो में ये घर मेरा है,
वो क्या जाने दिया हुआ सब तेरा है,
दो रोटी इज्जत की,
सदा देते रहना,
तेरी इतनी किरपा,
जब जब बाबा तुझसे मिलना चाहूँ मैं,
दौड़ा दौड़ा खाटू नगरी आउं मैं,
व्यवस्था ऐसी तू,
तेरी मुझ पे करना,
दौलत दे या ना दे तेरी मर्जी है,
पर ‘सोनू’ की बाबा तुझसे अर्जी है,
कभी ना खोऊँ मैं,
ये इज्जत का गहना,
स्वर – सौरभ मधुकर।
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