
मैं बिना दाम की दासी हूँ,
हरि आ जाओ हरि आ जाओ।।
ऐ मेरे प्रभु किरपा कर दो,
मेरे दोषों पर ध्यान ना दो,
अघसिंधु हूं मैं अघहारी प्रभु,
पापों को हरने आ जाओ,
तुम करुणा सिंधु कहलाते हो,
अपना यह प्रण क्यों भुलाते हो,
मेरी विनती है यही प्रभु,
करुणा करके तुम आ जाओ,
मुझ में ना साधना योग ज्ञान,
मैं अभिमानी छल कपट धाम,
मुझ में कुछ है सामर्थ नहीं,
प्रभु कृपा दृष्टि निज बरसाओ,
मुझ दासी को अपना लो प्रभु,
मुझे अपनी शरण में ले लो प्रभु,
इस ‘लाड़ली’ पर करुणा करके,
निज चरण शरण में ले जाओ,
स्वर – स्वामी अभयेश्वर प्रपन्नाचार्य जी महाराज।
लाड़ली सदन श्री धाम वृन्दावन।
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