
मोहें काहे हो ठुकराये कान्हा,
बिनु तोरे दर्श चैन न पाऊँ,
ये कैसी प्रीत लगाये कान्हा,
बिनु सुन मुरली तान तुम्हारी,
मोसे रहा न जाये कान्हा,
तोरी मद भरी अंखियाँ विह्वल कर दे,
ये दास कहाँ अब जाये कान्हा,
भवसागर में भटक रहा हूँ,
क्यूँ नहीं पास बुलाये कान्हा,
आभार: ज्योति नारायण पाठक
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