
रच डारे,, भर दिये भंडार ये जग ल रच डारे,
हे जग के सिरमौतिन दाई, अजब हवय वो तोर चरिताई,
किसम-किसम के रंग म, दाई रंग डारे…
झाड़ झरोखा हरियर हरियर, लता पेड़ के डारी वो,
बर पीपर अऊ तुलसी लीम के, जग म करे अधारी वो,
पानी बनाए पियास मिटाये, नदिया नरवा कछारी वो,
पानी घलो म जल के रहइया जीव बनाये चारी वो,
कस डारे, अपन मया के गांठ म, दाई कस डारे,
का महिमा मैं फूल के गांवव, टेसू मोंगरा के फुले वो,
जेन दुनिया भर ल महकाये, सावन झूलना झूले वो,
चिरई-चिरगुन पंछी परेवना, ये रचना कोन भूले वो,
होवत बिहिनिया चिंव-चिंव करथे, मया के रस म घुले वो,
कर डारे, ये धरती के हरा सिंगारी कर डारे,
कई ठन रूप के जीव बनाये, बेंदरा भालू बघूवा वो,
कोनो खाये घांस चबेना, कोनो मांस बर अघुवा वो,
सब झन बर तै चारा बनाये, दार चाऊंर अउ गहुवा वो,
अपन-अपन सब भाग ल पाके, मेटाये पेट के भूखवा वो,
हर डारे, सब झन के दुःख पीरा दाई हर डारे,
सबले अलग तोर रचना हे दाई, ये मनखे के चोला वो,
जेन तोर गुन ल गावत रइथे, आस रखे सब तोला वो,
सब बर जइसे मया बगराये, झन भुलाबे मोला वो,
मोरो पुराबे मन के मनौती, भर देबे खाली झोला वो,
लिख डारे, गौतम तोरे महिमा दाई लिख डारे,
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