
ले लो रे हरी का नाम,
कर्मा का साथी कोई नही....
एक माट्टी के दो दिवे थे,
दोनोवा के न्यारे न्यारे भाग,
एक जलया है माँ के मंदिर में,
दूजा चौराहे के बिच,
एक बाग़ में दो फुल लागे,
एक चढ़ा माँ के चरणों में,
दूजे का बन गया हार,
एक बेल पर दो फल लागे,
एक फल तो वो बहुत ही मीठा,
दूजे में भरी कडवास,
एक माता के दो बेटे थे,
एक बनया है नगरी का राजा,
दूजा मांगरया भीख,
एक राजा के दो रानी थी,
एक रानी तो जन जन हारी,
दूजी राख दी बाँझ,
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