
संकट मेट मुरारी माधव,
संकट मेट मुरारी रे।।
संकट में एक बंकट उपनियो,
कहत मृग की नारी,
क्या कहूं कित मैं जाऊं,
हेला दे दे हारी,
एक पासे बावर खींची,
दूजे अग्न जलाई,
तीजे पाड़े श्वान खड़ा है,
चौथे आप शिकारी,
उल्टे पवन से बावर जलगी,
श्वान शुची के लारी,
बंबी में से भुजङ्ग निकल्यो,
डसग्यो आप शिकारी,
जब वो मिर्गी नाचण लागी,
वाह वाह कृष्ण मुरारी,
सूर कहे प्रभु तुम्हारे भजन में,
अविगत की गति न्यारी,
प्रेषक – नरपत सेन झंवर।
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