
सजा दो उज्जैनी दरबार,
मेरे महाकाल आये है।
दोहा – करता करे ना कर सके,
शिव करे सो होय,
तीन लोक नौखंड में,
शिव से बड़ा ना कोय।
लगे क्षिप्रा भी गंगा सी,
तर्ज – मेरे सरकार आये है।
पखारों इनके चरणों को,
बहाकर प्रेम की गंगा,
पिला दो विष को अमृत सा,
(सरकार आ गए है मेरे गरीब खाने में,
आया है दिल को सुकून उनके करीब आने में,
मुद्द्त से प्यासी अखियो को मिला आज वो सागर,
भटका था जिसको पाने के खातिर इस ज़माने में।)
तुम आकर फिर नहीं जाना,
मेरी इस सुनी दुनिया से,
रमा दो भस्म भूतों सी,
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