
आजु रस, बरसत कुंजन माहिं।
मंजु-निकुंजनि-मंजुलता लखि,
विधि विधिताहुँ लजाहिं।
झूला डर् यो कदंब डार पै,
पै झूलत दोउ नाहिं।
पिय कह प्यारी ते 'तुम झूलहु,
हौँ तोहिं काहिं झुलाहिं'।
प्यारी कह पिय ते 'तू झूलहु,
हौं झुलवहुँ तोहिं काहिं'।
नहिं कोउ झूलत नाहिं झुलावत,
बहु विधि सखि समुझाहिं।
तब 'कृपालु' कह तुम दोउ झूलहु,
हम दोउ झुलवत आहिं ।।
भावार्थ - आज कुंज में विलक्षण रस बरस रहा है।
सुंदर निकुंज की सुंदरता देखकर ब्रह्मा की कारीगरी भी लज्जित होती है।
यद्यपि कदम्ब की डाल में झूला पड़ा है किन्तु प्रिया-प्रियतम दोनों ही नहीं झुलते हैं।
श्यामसुंदर कहते हैं कि हे सुकुमारी!
तुम झूलो और मैं झुलाऊँ।
किशोरी जी कहती हैं कि हे सुकुमार!
इस प्रकार न कोई झूलता है और न कोई झुलाता है।
सब सखियाँ समझा-समझाकर थक गई।
तब 'श्री कृपालु जी' कहते हैं कि आप दोनों में न कोई एक झूले और न कोई एक झुलावे वरन् आप दोनों साथ बैठकर झूलो और मैं झुलाऊँ।
पुस्तक - प्रेम रस मदिरा,निकुंज-माधुरी
पृष्ठ संख्या -262
पद संख्या -3
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