
धोड़े धोड़े ने बीरा धन जोडीयो,
ओ धन अटे धरेला।
दोहा – जबतक दिपक नही बुझे,
तबतक जानो तेल,
धनादास यु कहत है बीरा,
है आतम खेल।
राज धन ओर संपत्ति,
अविचल रहा न कोई,
जो घड़ी गई सतसंग में,
तुलसी धन है सोय।
नवलख जल का जीव है,
दस लख पंछी जान,
ग्यारह लाख किट ब्रंगी,
स्ताभर की सब खान,
तीस लाख पशु योनि,
चार लाख नर होय,
इनमें जो राम भजे,
हामल रे मन गेला,
ए धरमीराज लेखो पुचे,
ए हरी ने जवाब कोई देला,
ए मालिक ने जवाब कोई देला,
थोडो हामल रे मन गेला।।
अरे कंकर कंकर महल बनायो,
अरे ओ महल अटे जडेला,
ओ महल अटे जडेला,
अरे धरमीराज लेखो लेला,
अरे हरी ने जबालो मन गेला,
मालिक ने जवाब कोई देला,
अरे भाई रे बंधु थारे कुटम कबीलों,
अरे भाई रे बंधु कुटम कबीलों,
कोई थारे संग न चलेला,
अरे कोई थारे संग नही चलेला,
अरे हामल रे मन गेला,
अरे कहत कबीर सुनो भई संतो,
कहत कबीर सुनो भई संतो,
ए किदोडी कमाई भुगतेला,
किदी कमाई भुगतेला,
गायक – जोग भारती जी।
प्रेषक – मनीष सीरवी
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