
बता दो कोई माँ के भवन की राह,
श्लोक – दिखा दो डगर रे,
कोई माँ का दर रे,
मन में है चाव दीदार का,
भूल गया हूँ मैं परदेसी,
मैं राही माँ के द्वार का।
मैं भटका हुआ डगर से,
एहसान करो रे एक मुझपे,
बेटे को माँ से दो मिलाओ,
भेज बुलावा माँ ने दर पे बुलाया,
नंगे पाँव मैं चल दर्शन को आया,
कठिन चढाई से भी ना घबराया,
भूल हुई क्या ये समझ ना पाया में,
भुला रस्ता ना संग सखा,
ऊपर से ये घनघोर घटा,
मुझको रही है डराय,
कर किरपा दुखो ने मुझको घेरा,
कुछ सूझे ना छाया हर और अँधेरा,
माना बदियो में लगा रहा मन मेरा,
हूँ लाख बुरा पर माँ ये लख्खा तेरा,
माँ तेरे सिवा नहीं कोई मेरा,
फरियाद करूं मैं हाथ उठा,
कर भी दो माफ गुनाह,
कुछ सुनना है माँ तुमसे कुछ कहना है,
बिना दरश के पल पल बरसे नैना है,
तेरे नाम के रंग में रंग के चोला पहना है,
सरल सदा ही चरणों में अब रहना है,
जब दर पे लिया ‘लख्खा’ को बुला,
कँवले की तरह मत भटका,
दरसन दिखाओ मेरी माँ,
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