
म्हारा श्याम बहादुर जी थे कैयां पट खुलवाया
म्हारा श्याम बहादुर जी,
थे कैयां पट खुलवाया।।
तर्ज – मेरी बीच भंवर में है।
तर्ज – छोड़ गए बालम।
सेवक से मांगी चाबी जद,
वो करदी इनकार,
सेवक बोल्यौ खुद खुलवाल्यो,
बाबो थारो यार,
इतनी सुनकर गुरूवर बोल्या,
अब कोनी दरकार,
म्हारो बाबा खुद खोलेगो,
अपनों यो दरबार,
जय जयकार करी भगता नै,
बाबो हांसन लाग्यो,
बांको बालक जिद पै अड़कर,
लेन समाधि चाल्यो,
लेकर हाथां मोरछड़ी जद,
श्याम धनी नै ध्यायो,
बालक खातिर बाबो उठकर,
आधी रात नै आयो,
खोल किवाडी दर्शन देकर,
‘लाल’ नै खूब नचायो,
फूल की वर्षा हुई घनेरी,
चमत्कार दिखलायो,
थे अइयां पट खुलवाया।।
लेखक / प्रेषक – पदम बंसल।
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