
श्याम का खजाना लूट रहा रे,
लूट रहा लूट रहा लूट रहा रे,
लूट सके तो लूट ले बन्दे,
काहे देरी करता है,
ऐसा मौका फिर ना मिलेगा,
सबकी झोली भरता है,
इसकी शरण में आकर के,
जो कुछ भी माँगा मिल गया रे,
हाथों हाथ मिलेगा परचा,
ये दरबार निराला है,
घर घर पूजा हो कलयुग में,
भक्तो का रखवाला है,
जिसने भी इनका नाम लिया,
किस्मत का ताला खुल गया रे,
इसके जैसा इस दुनिया में,
कोई भी दरबार नहीं,
ऐसा दयालु ‘बनवारी’ ये,
करता कभी इंकार नहीं,
कौन है ऐसा दुनिया में,
जिसको बाबा नट गया रे,
स्वर – मनीष तिवारी।
प्रेषक – अविनाश मौर्य।
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