
हाथों की हथकड़ी,
पाँव की बेड़ियाँ,
खुल गए स्वयं ताले,
आनंद आ गया।।
तर्ज – मेरे रश्के कमर।
देखे – जन्माष्टमी भजन लिरिक्स।
दोहा – धरम का लोप होकर जब,
पापमय संसार होता है,
दुखी और दीन निर्बल का,
जब हाहाकार होता है,
प्रभु के भक्तो पर जब,
घोर अत्याचार होता है,
तभी संसार मे भगवान का,
अवतार होता है।
बात ही बात में,
भादों की रात में,
प्रकटे जब मुरली वाले,
नभ से बरसे सुमन,
श्याम बन गए ललन,
खेल हो गए निराले,
थे सिपाही खड़े,
द्वार पे जो अड़े,
सो गए पहरे वाले,
देवकी डर रही,
ठंडी आह भर रही,
माँ के दुःख पल में टाले,
ले के वसुदेवजी,
कृष्ण को चल पड़े,
टोकरे में संभाले,
सांवली छवि छटा,
छाई नभ पे घटा,
मेघ गरजे जो काले,
उतरे जमुना में जब,
डरे वसुदेव तब,
प्रभु ने पग जो निकाले,
पहुंचे गोकुल किशन,
माँ यशोदा प्रसन्न,
‘लख्खा’ मन से तू गाले,
पालने में पड़ा,
पालनहारी हरि,
बेधड़क कहते ग्वाले,
स्वर – लखबीर सिंह लख्खा जी।
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