
कोई अली आखे कोई वली आखे,
कोई कहे दाता सचे
मालिका नु ।
मेनू समज न आवे की नाम
देवा, एस गोल चकी दिया
चालका नु ॥
रूह दा असल मालिक ओही
मानिये जी, जिदा नाम लईए
ता सरुर होवे ।
अखा खुलिया नू महबूब
दिस्से, अखा बंद होवण ता
हुजुर होवे ॥
कोई सौन वेले कोई नहान
वेले, कोई गौण वेले तैनू
याद करदा ।
एक नजर तू मेहर दी मार
साईं, सरताज वी खड़ा
फरयाद करदा ॥
साईं वे साढी फरियाद
तेरे ताहि, साईं वे
बह्हो फ़ढ़ बेड़ा बन्ने
लाई ।
साईं वे मेरेआं गुनाहा
नु लुकाई, साईं वे हाजरा
हजूर वे तू आई ॥
साईं वे फेरा मस्कीना
वाल पाई, साईं वे बोल काक
सारा दे पुगई ।
साईं वे हक विच फैसले
सुनाई, साईं वे हौली –
हौली खामिया घटाई ।
साईं वे मेनू मेरे
अन्द्रो मुकाई, साईं जे
डीगिये ता फर के उठाई ।
साईं वे देखि ना भरोसे
आजमाई, साईं वे औखे -सौखे
रहा चो काढायीं ।
ओ साईं, कला नु वी होर
चमकाई, वे सूरा नु बिठा
दे थो – थाई ।
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