
अरे क्यु नैणा भरमावे थारे हाथ कबीरो नही आवे
अरे क्यु नैणा भरमावे,
थारे हाथ कबीरो नही आवे।।
अमर लोक से आई अपसरा,
गल मोतीयन की माला ओ,
नाच कूद ने तान बतावे,
कबीर का रूप हरतारा ओ,
जोगी मोया जती मोया,
शंकर नेजा धारी ओ,
पहाड़ो रा अवधूत मोया,
अबके कबीर थारी वारी,
रूपो पेर रूप दिखावे,
सोनो पेर रिझावे जी,
तोइ कबीर ना रिझावे,
ईन्दर बरये धरती भीगे,
पत्थर रो कई भीगे ओ,
मत कर सुरता आटक झाटक,
तोई कबीर ना रिझावे,
जात जलावो नाम कबीरो,
हे काशी रो वासी जी,
मारे मन मे एड़ी आवे,
एक माता दूजी मासी जी,
पांच इन्द्रियां वश मे किनी,
बांधी काचे धागे जी,
रामानन्द रा भणे कबीरा,
सूती सुरता जागी जी,
स्वर – प्रकाश माली
प्रेषक – पुखराज पटेल बांटा
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