
चलो अम्बे दरबार च छड के घर झूठे संसार दी,
भगतां नू चढ़ गई मस्ती.....जय हो....मस्ती अम्बे दे प्यार दी।
एह मस्ती मस्ती मस्ती..... मस्ती अम्बे दे प्यार दी,
एह मिले मिटा के हस्ती..... मस्ती अम्बे दे प्यार दी,
भगतां नू चढ़ गई मस्ती, मस्ती अम्बे दे प्यार दी।
आए ने नराते असी खुशियां मनाउनिया,
सारी सारी रात नच भेटां अज्ज गाउनिया,
ऐसी चढ़ गई नाम खुमारी, सूरत नहीं घर बार दी,
जो भी इस मस्ती च होया मस्ताना ए,
ओहनू फिर भूल जांदा अपना बेगाना ए।।
एहिओ मस्ती हर बंदे नू भवसागर तो तारदी,
लोकी सानु कहन्दे ने दीवाने कहन्दे रेहन दो,
सागर प्रीता दे दरां च रज बेह्न दो।।
हो गए मसत संजीव सिकंदर महिमा तक दरबार दी,
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