
जिनका घर हो अयोध्या
जैसा उनकी होत बड़ाई
आगे आगे राम चलत है
पीछे लक्मण भाई
कौशल्या तोहरे अंगनवा मा
जय जय राम सिया राम
सिया राम सिया राम
भरत शत्रुघन से है देवर
सीता स्नेह लुटाती जिन पर
गुण अवगुण यह कुछ न जाने
मात पिता को तीर्थ माने
दशरथ के चार लाडले
दसरथ के चार लाडले
तुलसी की चौपाई
राम के कोई बहिन न थी
उनको शायद यही कमी थी
इस घर में है छोटी बहन
हर भाई का सुख और चैन
बात बात में खेल करात है
नंदी और भौजाई
कितना भजन करो
कितना जतन करो
आया समय कभी कल का नहीं
स्वारथ की धरती पर बोया
जो पत्थर पौधा
कभी भी फैलता नहीं
रावण था अभिमानी
करता था मनमानी
दुनिया से खुद ही जता रही
सीता की शक्ति को
लक्समन की भक्ति को
संस्कार गीतों में गता रहा
रघुकुल रीति सदा चली आई
प्राण जाए पर वचन न जाए
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