
तर्ज – दीवानो से ये मत पूछो
दीवाने है जो उस प्रभु के,
उनको दुनिया से काम नहीं,
काम नहीं काम नहीं,
मन रहता है प्रभु चिंतन में,
पल भर करता आराम नहीं,
वे जग चिंता से मुक्त रहे,
और मगन रहे हरी सुमिरन में,
जगदीश हरे जगदीश हरे,
रसना पे दूजा नाम नहीं,
जिसको पी और नहीं पीते,
जिसका ना कभी ढलता है नशा,
उस राम नाम की मदिरा के,
तुम क्यों पीते हो जाम नहीं,
जाम नहीं जाम नहीं,
वे नर ही नहीं नर अधम कहो,
और वो पशुओ से भी बत्तर है,
उनका जीना क्या जीना है,
जिनके व्यवहार में राम नहीं,
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