
नजर मिलते ही बाबा से खुशी से फूल जाता हूँ
नजर मिलते ही बाबा से,
खुशी से फूल जाता हूँ,
सोच कर घर से जो आया,
वो कहना भूल जाता हूँ।
तर्ज – सजा दो घर को।
अजब जादू है आंखों में,
समंदर जैसी गहरी है,
डूब जाता हूं जब इनमें,
निकलना भूल जाता हूँ,
मोहिनी तेरी ये सूरत,
खींच लाती है हर ग्यारस,
तेरी चौखट पे गिर कर के,
संभलना भूल जाता हूँ,
यहां ‘बेधड़क’ आकर के,
फिर जाने को दिल नहीं करता,
ठहर जाते कदम मेरे,
मैं चलना भूल भूल जाता हूँ,
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