
बिन पिये नशा हो जाता है जब सुरत देखूं मोहन की
बिन पिये नशा हो जाता है,
जब सुरत देखूं मोहन की,
ना जाने क्या हो जाता है,
बिन पिए नशा हो जाता है,
तर्ज – मोहन से दिल क्यों लगाया है।
मनमोहन मदन मुरारी है,
जन जन का पालनहारी है,
ये दिल उस पर ही आता है,
घुंघराली लटें मुख पर लटके,
कानों में कुण्डल है छलके,
जब मन्द मन्द मुस्काता है,
अंदाज निराले है उनके,
दुख दर्द मिटाते जीवन के,
मेरा रोम रोम हर्षाता है,
वाणी में सरस व्यवहार सरल,
आंखो में है अंदाज उमंग,
वो आनन्द घन बरसाता है,
देखे – तुम रूठे रहो मोहन।
स्वर – अलका जी गोयल।
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