
रघुनाथ के चरणों में,
दे दो जीवन की नाव रे,
जो उनसे दया पाए,
तक़दीर संवर जाए।
तर्ज – अखियों के झरोखों से।
विश्वास को तू अपने,
कभी खोने नहीं देना,
चरणों से अलग,
इस मन को कभी,
तुम होने नहीं देना,
सत छोड़ कुपथ पर तू,
कभी देना ना पाँव रे,
जो भी ईश्वर की भक्ति में,
तन मन से लगा है,
पहरा करने उसका प्रभु,
हमेशा जगा है,
उसपे ना किसी का भी,
चलता है दाव रे,
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