
आत्मा ने परमात्मा को लिया
देख ध्यान की दृष्टि से
प्रकाश हुआ हृदय-हृदय
बेड़ा पार हुआ इस सृष्टि से
है एक ओंकार निरंजन निरंकार
है अजर अमर आकर
विश्वधार मन भजे
शिवोहम शिवोहम शिवोहम..
भूख में तपसी तप रहा
भोजन बीच पठाय
विलप में साधु हंस रहा
अपना ही उपजा खाय
शेष अशेष विशेष में
समर्पण के भाव में
ठहर शांत एकांत में
साधके मूलाधार
सर्जन स्वाधिष्ठान से
सूर्य मणि चमकार
विशुद्धि आज्ञा सहसरार
तक गूंजे अनाहत
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