
दरबार अनोखा सरकार अनोखी,
खाटू वाले की हर बात अनोखी।।
जब भी आता हूँ दरबार में इनके,
मैं खो जाता हूँ श्रृंगार में इनके,
नित नई नवेली मुस्कान है इनकी,
जादूगर ऐसा इस कदर लुभाले,
बातें क्या दिल की ये दिल ही चुराले
कुछ होश नहीं है मुझको तन मन की,
विपदाओं से दिल तू क्यों घबराए,
ले नाम प्रभु का प्रभु पार लगाए,
करते रखवाली अपने प्रेमी की,
यहाँ मन की मुरादे पाते हुए देखा,
देखी है बदलती किस्मत की रेखा,
‘नन्दू’ फैली है चहुँ सत्ता इनकी,
स्वर / लेखक – नंदू जी शर्मा।
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